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Satish27 Nov, 2018

मधुशाला के रचयिता हरिवंश राय बच्चन के बारे में जानिए कुछ अनसुनी और अनकही बातें 

कर शपथ..कर शपथ,अग्निपथ..अग्निपथ

'मधुशाला', एक ऐसा नाम जो जुबान पर आते ही एक शख्स की याद दिलाता है और वो नाम है 'हरिवंश राय बच्चन'। हिंदी साहित्य जगत का एक ऐसा कवि जिसने मंच परंपरा से ऐसा नाम कमाया कि बाकियों को ईर्ष्या तक होने लगी। शायद यही वजह रही कि उनके रचना कर्म पर जो काम होना चाहिए था, नहीं हुआ। आलोचकों ने उन्हें बहुत ज्यादा महत्व नहीं दिया। वो तो पाठकों और श्रोताओं ने बच्चन को बच्चन बनाया।

मधुशाला का पहला काव्य पाठ 1933 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के शिवाजी हॉल में हुआ था। उस काव्य पाठ के बाद सभी मधुशाला के दीवाने हो गए और बच्चन के मुरीद भी। उड़ते-उड़ते जब बात फैली तो उसके अगले ही दिन सबके आग्रह पर अँग्रेजी विभाग के प्रोफेसर मनोरंजन प्रसाद सिन्हा सभापति बनें और शुरू हुआ मधुशाला का एकल काव्य पाठ। उस काव्य पाठ में लोगों का इतना हुजूम उमड़ पड़ा कि लोगों को हॉल के बाहर खड़े होकर सुनना पड़ा। बावजूद इसके लोगों के जोश में कोई कमी नहीं आई। 

ये तो बच्चन की रचना का एक पहलू मात्र था। हालाँकि इसी पहलू ने उन्हें लोकप्रियता के उस शिखर पर बैठा दिया जहाँ हिंदी साहित्य जगत का कोई रचनाकार नहीं पहुँच पाया था। आज उनके जन्मदिन के अवसर पर हम उनके जीवन से जुड़े कुछ पहलुओं और उनके रचना संसार से आपको रूबरू करवाएंगे। तो आइये मेरे साथ, चलते हैं काव्य जगत की सैर पर और पूरा करते हैं एक अनोखा और अविस्मरणीय सफर।