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अगर दारु और गड्डी वाले गानों ने दुखा दिए हैं कान, तो दिल और कान दोनों को सुकून देंगे ये सूफी गाने

रेगिस्तान की धूप में ठंडी हवा के झोंखे जैसे हैं ये गाने। 

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गड्डी, कुड़ी, दारु, पैग, स्वेग, टशन आदि कुछ ऐसे मोती हैं जो आजकल हर लिरिक्स राइटर और म्यूजिक कम्पोजर के पास बोरे भरकर पाए जाते हैं। उनके पास जब कोई इंसान गाना बनाने का ऑफर लेकर आता है तब वो किसी घिसी-पिटी या पुराने गानों की धुन के धागे में इन्हीं मोतियों को पिरोकर एक नया गाना बना देते हैं। एकाध महीने तक उस गाने की धुन पर लोग पार्टियों में थिरक लेते हैं और उसके बाद वो गाना गुमनाम हो जाता है।

संगीत की बर्बादी के इस दौर में सिर्फ सूफी संगीत ही है जो रूह बनकर उसे जिन्दा रखे हुए है। इसे सुनकर ऐसा महसूस होता है जैसे रेगिस्तान की चिलचिलाती धूप में ठंडी हवा का झोंका। जैसे सूखते गले में, मटके का ठंडा पानी।

अगर आपके कान भी दारु और गड्डी वाले गाने सुन-सुन कर दर्द देने लगे हैं तो आपके लिए पेश हैं कानों को सुकून पहुंचाने वाले कुछ बेहतरीन सूफी गाने।

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