भीख, भजन और दान के सहारे सूनी ज़िदंगी काट रही हैं वृंदावन की ये विधवाएं 

आंखों में आंसू ला देंगी इन औरतों की कहानी। 

"रंग से दूर, जीवन के हर ढंग से दूर,

अपनों से दूर, ज़िदंगी के सब सपनों से दूर,

साज-श्रंगार से दूर, तीज-त्यौहार से दूर,

हंसी-खुशी से दूर, तन्हा जीने को मजबूर"

ये हैं वृंदावन की वो विधवाएं, जो कान्हा की नगरी में वीरान ज़िदंगी जीने को मजबूर हैं। कान्हा की इस नगरी में हज़ारों की तादाद में विधवाओं का बसेरा है। वृंदावन की लगभग हर गली में, हर मंदिर के आस-पास, आपको सैकड़ों की संख्या में माथे पर तिलक लगाए, ये विधवाएं नज़र आ जाएंगी।

इन सभी की अलग कहानी है, ज़िदंगी से कई शिकवें हैं, अपनों का रास्ता देखते हुए आंखे बोझल हो चुकी हैं।आइए जानते हैं अपनी व्यथाओं के बीच किस तरह से ज़िदंगी गुज़ार रही हैं ये महिलाएं।