अगर सालों पहले किसी ने कहा होता कि, 'वो खूबसूरत काली लड़की' तो ये दुनिया बहुत अलग होती

डियर शाहरुख़ खान ये आपके लिए है। 

"अगर हमने चार सौ साल पहले कहा होता कि 'वो खूबसूरत काली लड़की' तो ये दुनिया बहुत अलग होती।"

'जश्न-ए-रेख्ता' में मशहूर राइटर, जर्नलिस्ट और स्टोरीटेलर नीलेश मिसरा द्वारा कही गई ये बात जब से मैंने सुनी है, वक्त-बेवक्त जेहन में आ जाती है। शायद इसलिए क्योंकि मेरा रंग भी सांवला है और सदियों पहले बनाए गए सुंदरता के पैमानों पर मेरा कद भी, मेरे जैसे करोड़ों लोगों की तरह बौना पड़ जाता है।

एक सांवली लड़की अपने घर वालों के साथ टीवी देखते वक्त किसी एडल्ट सीन को देखकर उतनी असहज नहीं होती जितनी वो किसी फेयरनेस क्रीम के विज्ञापन को देखकर हो जाती है। इसमें दिखाया जाता है कि अगर वो गोरी नहीं है तो ना वो जिंदगी में प्यार पा सकती है और ना कामयाबी। विज्ञापन देख रही सिर्फ वो लड़की ही नहीं बल्कि उसके साथ टीवी देख रहे लोग भी, ना चाहते हुए भी उस विज्ञापन में उसे इमेजिन करने लगते हैं। वो तो सोशल मीडिया पर अपनी प्रोफाइल फोटो लगाने से भी डरती है क्योंकि उसे खुद की शक्ल वक्त के साथ खराब लगने लगती है।

अगर वाकई किसी ने सदियों पहले काले रंग को सुन्दर बता दिया होता तो आज ये दुनिया बहुत अलग होती। असल में ना सही मगर लफ्ज़ों के जरिये ही चलिए एक बार उस काल्पनिक दुनिया की सैर करके आते हैं।