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Vishal Dubey 11 Feb, 2019 07:25 73268 8

जलकुकड़े साहित्य प्रेमियों को क्यों नहीं पच रही JLF में बढ़ती भीड़

1 लाख से ज्यादा लोगों ने उठाया साहित्य महोत्सव का आनंद।

छठी शताब्दी ई.पू. में जब ग्रीस से थिएटर और ड्रामा की शुरुआत हुई तो केवल धार्मिक मान्यताओं को पूरा करने और देवताओं को खुश करने के लिए कलाकार मंच पर अपनी कला दिखाते थे। लोकप्रियता की बात करें तो विश्व भर में छिटपुट तौर पर ड्रामा देखा जाता था। या कहिए कि उस दौर में प्रत्यक्ष तौर पर कोई दर्शक नहीं हुआ करता था। सब धर्म और मान्यताओं के चलते मंच के नजदीक जाते थे। धीरे-धीरे वक्त बदला और थिएटर के इतिहास में कहानियों की संख्या बढ़ने लगी। अच्छे लेखकों के आने के बाद नाटक के भाव और रस में भी परिवर्तन आते गए। शुरूआती दिनों में ट्रेजेडी ड्रामा का बोलबाला हुआ करता था लेकिन नाटक की विधा में और लेखकों के आने के बाद कॉमेडी को भी इसका हिस्सा बनाया गया। फिर भी समस्या ज्यों की त्यों थी, दर्शकों का अभाव।

दरअसल पांचवीं और चौथी शताब्दी ई.पू. में कलाकार पैसे कमाने के लिए राजा के दरबार में ही नाटक का प्रदर्शन करते थे। जिसके बाद वो खाली बैठे रहते थे या अपने अन्य पेशों में जुट जाते थे। उस दौर के सम्राटों ने इस कला को बढ़ावा देने के लिए एक जुगाड़ निकाला। घोषणा की गई कि राज दारबार से बाहर भी नाटकों का प्रदर्शन किया जाए और जनता से ये बोला गया कि 'जो भी इसे देखने आएगा उसे कुछ धनराशि दी जाएगी'। फिर क्या था लोगों की भीड़ उमड़ने लगी। नए और बड़े थिएटर हॉल बनने लगे। नाटक का प्रचार प्रसार भी होने लगा, लोगों की इस कला के प्रति दीवानगी भी बढ़ने लगी। लेखक और दर्शकों की संख्या दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ते देख पैसे देने वाला ऑफर बंद कर पैसे लेने वाला चलन शुरू हो गया। अब आप नाटक का रूपांतरण सिनेमा, टीवी, रेडियो और डिजिटल माध्यम में देख रहे हैं साथ ही क्लासिकल नाटकों के लिए भी समानांतर एक स्पेस बनी हुई है।

ऊपर की बातों से ये स्पष्ट होता है कि कोई भी चीज यदि रुचिकर और मनोरंजक है तो लोगों को उसकी आदत डलवानी पड़ती है फिर चाहे उसके लिए कोई भी कीमत क्यूँ ना चुकानी पड़े। खैर वो लोग जो साहित्य सम्मेलनों में भीड़ न पाकर बौखला जाते हैं और ये दावे कर देते हैं कि अब लिटरेचर का अवसान होने वाला है। आज वही लोग जयपुर साहित्य महोत्सव में बढ़ती भीड़ को देखकर भी परेशान हैं। दोनों बातें बिलकुल विपरीत हैं और इनमें छिपी चिंताएं भी। आइए जानते हैं कि आखिर साहित्य महोत्सव को आउटिंग प्वाइंट की तरह क्यूँ नहीं देख पा रहे साहित्यप्रेमी।